भारत में उभरती पर्यावरणीय प्रौद्योगिकियाँ
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) हेतु: राष्ट्रीय सौर मिशन, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR), अपशिष्ट-से-ऊर्जा, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, कार्बन कैप्चर एवं भंडारण (CCS), डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC), पेरिस समझौता, लॉस एंड डैमेज फंड, ग्रीन क्लाइमेट फंड, GIS, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन, LiDAR, विलवणीकरण, IoT-आधारित जल प्रबंधन, जियोइंजीनियरिंग।
मुख्य परीक्षा (Mains) हेतु: सतत विकास, जलवायु परिवर्तन शमन एवं अनुकूलन में उभरती पर्यावरणीय प्रौद्योगिकियों की भूमिका तथा इनके बड़े पैमाने पर अपनाने की संभावनाएँ और चुनौतियाँ।
संदर्भ
भारत वायु एवं जल प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, बढ़ते अपशिष्ट, जल संकट और पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण जैसी प्रमुख पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। उभरती प्रौद्योगिकियाँ स्वच्छ ऊर्जा, संसाधन दक्षता, जलवायु लचीलापन और सतत विकास की दिशा में परिवर्तन को गति दे सकती हैं।
भारत में प्रमुख उभरती पर्यावरणीय प्रौद्योगिकियाँ कौन-सी हैं?
नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियाँ
- सौर ऊर्जा: भारत स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में सौर ऊर्जा का तेजी से विस्तार कर रहा है।
- राष्ट्रीय सौर मिशन, सौर फोटोवोल्टिक तकनीक, रूफटॉप सोलर तथा राज्य-स्तरीय प्रोत्साहन सौर ऊर्जा के व्यापक उपयोग को बढ़ावा दे रहे हैं।
- पवन ऊर्जा: भारत में विशेषकर गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ऑनशोर तथा ऑफशोर पवन ऊर्जा की महत्वपूर्ण क्षमता है।
- उच्च-दक्षता वाली टर्बाइन, ग्रिड एकीकरण और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में सुधार से अनिरंतरता की समस्या को कम करने में सहायता मिल सकती है।
- जलविद्युत एवं जैव-ऊर्जा: जलविद्युत नवीकरणीय बिजली में योगदान देती है, जबकि बायोगैस, जैव ईंधन और बायोमास ऊर्जा कृषि एवं जैविक अपशिष्ट को उपयोगी ऊर्जा में परिवर्तित कर सकते हैं।
अपशिष्ट प्रबंधन एवं पुनर्चक्रण
- अपशिष्ट-से-ऊर्जा (WtE) प्रौद्योगिकियाँ: इन तकनीकों के माध्यम से उपयुक्त अपशिष्ट को ऊर्जा या ईंधन में परिवर्तित किया जाता है।
- बायोमिथेनेशन जैविक अपशिष्ट से बायोगैस उत्पन्न करता है, जबकि गैसीकरण कार्बन-समृद्ध अपशिष्ट को संश्लेषण गैस में परिवर्तित करता है, जिसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है।
- प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन: भारत प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए पुनर्चक्रण, पुनः उपयोग और वैकल्पिक सामग्रियों को बढ़ावा दे रहा है।
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) उत्पादकों को निर्धारित उपभोक्ता-पश्चात अपशिष्ट के प्रबंधन के लिए उत्तरदायी बनाता है।
- ई-कचरा प्रबंधन: तेजी से बढ़ते डिजिटलीकरण के कारण इलेक्ट्रॉनिक कचरे में वृद्धि हुई है, जिससे सुरक्षित संग्रह एवं पुनर्चक्रण महत्वपूर्ण हो गया है।
- रिवर्स लॉजिस्टिक्स जीवन-चक्र पूरा कर चुके इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के संग्रह, पुनर्प्राप्ति, पुनर्चक्रण और उचित निपटान में सहायता करता है।
जल शुद्धीकरण एवं अपशिष्ट जल उपचार में नवाचार
- विलवणीकरण प्रौद्योगिकियाँ: जल-संकट वाले तटीय क्षेत्रों में विलवणीकरण मीठे जल का एक अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध करा सकता है।
- रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) का उपयोग समुद्री एवं खारे जल से घुले हुए लवण और अशुद्धियों को हटाने के लिए किया जाता है।
- वर्षा जल संचयन एवं पुनः उपयोग प्रौद्योगिकियाँ: वर्षा जल संचयन जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर जल-संकट वाले क्षेत्रों में।
- IoT-आधारित जल प्रबंधन प्रणालियाँ सेंसर और डेटा विश्लेषण के माध्यम से रिसाव की पहचान, जल खपत की निगरानी और जल उपयोग दक्षता में सुधार कर सकती हैं।
- राजस्थान की कुंड/कुंडी जैसी पारंपरिक प्रणालियाँ स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जल संरक्षण के महत्व को दर्शाती हैं।
जलवायु परिवर्तन शमन एवं अनुकूलन प्रौद्योगिकियाँ
- कार्बन कैप्चर एवं स्टोरेज (CCS): CCS कुछ ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों से उत्सर्जन कम करने में सहायता कर सकता है, जहाँ उत्सर्जन में कमी लाना कठिन है।
- पॉइंट-सोर्स कैप्चर केंद्रित औद्योगिक उत्सर्जन से CO₂ को अलग करता है।
- डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC) वायुमंडलीय हवा से सीधे CO₂ को हटाता है, हालांकि वर्तमान में इसमें लागत और ऊर्जा से जुड़ी महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं।
- हरित हाइड्रोजन: हरित हाइड्रोजन का उपयोग इस्पात, रसायन, उर्वरक, भारी परिवहन और अन्य कठिन-से-विद्युतीकृत क्षेत्रों में किया जा सकता है।
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, जिसे 2023 में शुरू किया गया, भारत को हरित हाइड्रोजन के प्रमुख उत्पादक एवं उपयोगकर्ता के रूप में विकसित करने तथा स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को समर्थन देने का लक्ष्य रखता है।
पर्यावरणीय निगरानी में ड्रोन एवं GIS का उपयोग
- ड्रोन (UAV) एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS): उपयुक्त सेंसर से लैस ड्रोन उच्च-रिजॉल्यूशन इमेजरी के माध्यम से वनस्पति, जल निकायों और भूमि उपयोग में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी कर सकते हैं।
- इनका उपयोग वनों की कटाई, भूमि क्षरण, आवासीय परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षति के आकलन में किया जा सकता है, जबकि GIS प्राप्त स्थानिक डेटा के विश्लेषण एवं दृश्यांकन में सहायता करता है।
- ये तकनीकें हिमनदों, तटीय क्षरण, आर्द्रभूमियों और वन पारिस्थितिक तंत्रों की निगरानी में भी सहायक हैं।
- सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग, GIS और ड्रोन आधारित सर्वेक्षण मिलकर पर्यावरणीय निगरानी एवं संरक्षण योजना के लिए पूरक उपकरण उपलब्ध कराते हैं।
जलवायु परिवर्तन के हस्तक्षेप हेतु जियोइंजीनियरिंग
- जियोइंजीनियरिंग के उपायों को व्यापक रूप से दो श्रेणियों में समझा जाता है:
- सौर विकिरण प्रबंधन (SRM): इसका उद्देश्य आने वाले सौर विकिरण के एक छोटे हिस्से को परावर्तित करके तापवृद्धि को कम करना है। ये उपाय अभी मुख्यतः प्रायोगिक अवस्था में हैं और इनमें महत्वपूर्ण पर्यावरणीय एवं शासन संबंधी अनिश्चितताएँ हैं।
- कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन (CDR): इसमें वनीकरण, डायरेक्ट एयर कैप्चर, बायोएनर्जी विद कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (BECCS) तथा एन्हांस्ड वेदरिंग जैसी विधियों द्वारा वायुमंडल से CO₂ हटाया जाता है।
- DAC: विशेष प्रणालियों के माध्यम से वायुमंडलीय हवा से सीधे CO₂ को निकालकर उसका भंडारण या उपयोग किया जाता है।
- CCUS: कैप्चर की गई CO₂ का औद्योगिक उपयोग या दीर्घकालिक भूगर्भीय भंडारण किया जा सकता है।
प्रमुख सरकारी पहल
- राष्ट्रीय सौर मिशन – सौर ऊर्जा के विकास को बढ़ावा देना।
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन – हरित हाइड्रोजन पारिस्थितिकी तंत्र का विकास।
- EPR ढाँचा – निर्धारित अपशिष्ट धाराओं के लिए उत्पादक की जिम्मेदारी सुनिश्चित करना।
- राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति, 2022 – भारत के भू-स्थानिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना।
- SVAMITVA योजना – ग्रामीण संपत्तियों के मानचित्रण में ड्रोन एवं GIS का उपयोग।
- राष्ट्रीय जल नीति एवं जल संरक्षण पहल – जल के कुशल प्रबंधन एवं संरक्षण को बढ़ावा देना।
मुख्य परीक्षा हेतु मूल्यवर्धन: उभरती पर्यावरणीय प्रौद्योगिकियाँ भारत के विकास लक्ष्यों को समर्थन दे सकती हैं, लेकिन इनकी सफलता सामर्थ्य, तकनीकी परिपक्वता, बुनियादी ढाँचे, कुशल मानव संसाधन, पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों, वित्तपोषण और प्रभावी नीतिगत क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा के पूर्ववर्ती वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रारंभिक परीक्षा
प्रश्न: ‘वॉटर क्रेडिट’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (2021)
- यह जल एवं स्वच्छता क्षेत्र में माइक्रोफाइनेंस उपकरणों का उपयोग करता है।
- यह विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक के तत्वावधान में शुरू की गई एक वैश्विक पहल है।
- इसका उद्देश्य गरीब लोगों को सब्सिडी पर निर्भर हुए बिना अपनी जल आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम बनाना है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3उत्तर: (C)
मुख्य परीक्षा
प्रश्न: घटते जल संसाधनों की स्थिति में जल भंडारण एवं सिंचाई प्रणाली को बेहतर बनाने तथा जल के विवेकपूर्ण उपयोग हेतु उपाय सुझाइए। (2020)
प्रश्न: “सस्ती, विश्वसनीय, सतत और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने की अनिवार्य शर्त है।” इस संदर्भ में भारत द्वारा की गई प्रगति पर टिप्पणी कीजिए। (2018)